गौशाला: एक संक्षिप्त परिचय

वैदिक काल से ही गाय भारतीय धर्म, संस्कृति, सभ्यता व अर्थव्यवस्था का प्रतीक रही है। आज भी भारत एककृषि प्रधान देश है। भारत में विकास के अक्षय स्वरूप का महत्व परंपरा से जिसमें प्रकृति से सामंजस्य रखतेहुए चिर-स्थायी विकास की परिकल्पना रही है। हमारी अक्षय कृषि जैविक-नैसर्गिक संसाधनों पर आधारित थी,जिसकी कड़ी पशुपालन से जुड़ी थी। अमृततुल्य गौ दुग्ध के अतिरिक्त खेत जोतने व भार ढ़ोने के लिए बैल,भूमि की उर्वस्ता बनाये रखने के लिए उत्तम जैविक खाद तथा गौमूत्र से बनने वाली औषधियाँ गाय से ही प्राप्तहोती हैं। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों ने गौवंश की बहुआयामी उपयोगिता को बहुत ही प्रभावी तरह सेरेखांकित किया है।

आधुनिक भौतिकता के इस दौर में जब मानवीय मूल्यों का हृास हो रहा है, गायों की स्थति भी अत्यन्त दयनीयहो गई है। सड़कों पर निरीह गायों का घूमते हुए अक्सर देखा जा सकता है। नौएडा जैसे महानगरों में तो यहसमस्या और भी विकट है। गौमाता का संरक्षण व संवर्धन करना भारतीय संस्कृति की चेतना का केन्द्र बिंदु हैतथा इसका निर्वाह करना सम्पूर्ण समाज का दायित्व है।

इन्ही उदेश्यों की पूर्ति हेतू नौएडा में गौसदन की स्थापना श्री जी गौसदन के नाम से सन् 2001 में गोपाल जी कीअध्यक्षता में भारत विकास परिषद् द्वारा की गई। यह भूखण्ड सं॰-7, सैक्टर-94, नौएडा में 9 एकड़ भूमि परस्थित है। इस समय गौसदन मे 800 से अधिक गाय, बैल, बछड़े एवं बछियों की देखभाल हो रही है। समाज केसहयोग से गौसदन में 11 गाय घर, दो भूसा घर एक पशु चिकित्सालय, एक भंडार गृह व कर्मचारी आवास एवंदो गौबर गैस संयत्र का निर्माण हो चुका है। गौसदन में गौबर की खाद व जैविक खाद भी तैयार की जाती है।प्रतिवर्ष गौसदन में वृक्षारोपण भी किया जाता है।

प्रत्येक मास के प्रथम रविवार को प्रातः गौसदन में मासिक मिलन कार्यक्रम के अन्र्तगत हवन का आयोजनकिया जाता है। जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के बन्धु शामिल होते हैं।